वाराणसी। भारत की गौरवशाली विरासत व संस्कृति का बोध केवल एक ही शहर करा सकता है और वह है बनारस। यदि आप बनारस को समझ लिए तो यकीन मानिए आप भारत की संस्कृति व सभ्यता से भी रूबरू हो जायेंगे। यही कारण है कि काशी पूरे विश्व के लोगों को अपनी ओर खींचने का कार्य करती है। विदेशी जितने बार भी बनारस आते हैं, उनका आकर्षण बढ़ता जाता है। यहां अध्यात्म है, भारत की पहचान व अस्तित्व की गाथा है। इसी क्रम में खेले मसाने में होली दिगंबर परंपरा का निर्वहन महाश्मशान मणिकर्णिका घाट पर हुआ। महादेव की लीला रंगभरी एकादशी के अलगे दिन मनाई गई। मणकर्णिका घाट पर सुबह—सुबह ही लोग पहुंच गये। इसके बाद लोग रंग—गुलाल व चिता भस्म से सराबोर नजर आए। हाथों में डमरू व अन्य वाद्य यंत्र लोगों के उत्साह को बयां कर रहा था। यह नजारा वाकई में काफी अनोखा रहा। एक ओर चिताओं की आग धधक रही थी तो दूसरी तरफ लोग फक्कड़ स्वभाव में भौतिकतवाद का परित्याग करके चिता की भस्म से होली खेल रहे थे। कहा जाता है कि भगवान शिव खुद इस दिन यहां पर आते हैं। साथ ही महादेव का श्रृंगार भी किया गया। श्रृंगार के बाद महादेव का अनुष्ठान हुआ। चिता भस्म से सराबोर लोग जीव नहीं बल्कि शिव के रूप में नजर आ रहे थे। प्रत्येक वर्ष की तरह इस बार भी विदेशी पर्यटकों ने भी चिता भस्म होली का लुत्फ उठाया। वहीं इस मौके पर संगीत घरानों के कलाकार भी समां बांधने के लिए पहुंचे थे। भूत—प्रेत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व, किन्नर व बाबाओं की टोली देखकर विदेशी पर्यटक हैरान नजर आए।

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