दिल्ली। यदि यूपी की सियासत की बात हो और जाति की बात न हो तो बात अधूरी रह जाती है। यूपी की सियासत में जाति का महत्वपूर्ण स्थान है। जातियों का समीकरण यूपी की सियासत का रास्ता तय करता है। जो राजनीतिक दल इन समीकरणों को अपने अनुकूल फिट कर लेता है, वह सियासी वैतरणी पार कर लेता है। यही कारण है कि इन दिनों यूपी में राजभर वोट के लिए हर दल की ओर से सियासी कवायद की जा रही है क्योंकि पूर्वांचल सहित बहराइच वगैरह के बेल्ट में राजभर वोट बैंक का एक बड़ पैकेट है। आगामी विधानसभा चुनाव को फतह करने के लिए इसी पर सभी राजनीतिक दलों की निगाहें लगी हुई हैं। यदि बात राजभर वोट बैंक व सियासत की हो रही है तो इसमें ओमप्रकाश राजभर का जिक्र करना जरूरी है। वह सुभासपा अध्यक्ष हैं, साथ में प्रदेश सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। यदि आज सत्ताधारी दल भाजपा समेत तमाम राजनीतिक दलों की ओर से राजभर समाज में अपनी—अपनी पैठ बनाने की कोशिश की जा रही है तो इसका प्रमुख कारण ओमप्रकाश राजभर भी हैं। ओमप्रकाश राजभर खुद को यूपी में राजभर समाज के चेहरे के रूप में स्थापित कर चुके हैं। उनके पहले भी राजभर समाज के कई नेता चमके लेकिन एक अलग पार्टी बनाकर ओमप्रकाश राजभर इस मामले में अन्य लोगों से काफी आगे निकल गये। अपनी पार्टी के जरिये वह प्रदेश स्तर पर खुद को राजभर समाज के चेहरे के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रहे। उनकी सफलता को इसी बात से समझा जा सकता है कि बीते विधानसभा चुनाव के दौरान भाजपा को सुभासपा संग गठबंधन करना पड़ा था। सत्ता में भाजपा के आने के बाद ओमप्रकाश राजभर को मंत्री भी बनाया गया। यह सब इसलिए हुआ कि ओमप्रकाश राजभर सुभासपा के रूप में पार्टी बनाकर राजभर समाज के लोगों को लामबंद किए और सियासी रूप से प्रदेश स्तर पर यह संदेश देने में सफल रहे कि वह राजभर समाज के प्रमुख चेहरे हैं। हालांकि बाद में कलह व मतभेद के कारण ओमप्रकाश राजभर व योगी सरकार का रिश्ता टूट गया। जिस प्रकार से विभिन्न क्षेत्रीय राजनीतिक दलों का आधार उनकी अपनी—अपनी जातियां हैं, उसी प्रकार से सुभासपा की सियासी पिच राजभर समाज है। राजभर समाज की बात करने के कारण ही ओमप्रकाश राजभर व उनकी पार्टी की पहचान है। वहीं इसके पूर्व कभी भी प्रदेश स्तर पर राजभर वोट बैंक के लिए इतनी मारामारी राजनीतिक दलों में नहीं देखी गई थी। यदि आज प्रदेश स्तर पर राजभर समाज की सियासी रूप में पूछ बढ़ी है तो इसके पीछे प्रमुख कारण ओमप्रकाश राजभर भी हैं। उन्होंने अपनी पार्टी का गठन करके यह संदेश देने में पूरी तरह से कामयाब रहे कि वह राजभर समाज के अगुआ हैं और राजभर समाज सियासी रूप से पूरी तरह से एकजुट हैं। उन्होंने यूपी की सियासत में राजभर समाज की ताकत का एहसास कराने का काम किया। यही कारण है कि ओमप्रकाश राजभर को सियासी रूप से डैमेज करने के लिए भाजपा की ओर से लगातार मंत्री अनिल राजभर को आगे बढ़ाने का कार्य किया जा रहा है। महाराजा सुहेलदेव जयंती से लेकर तमाम तरह की कवायद जारी है। वहीं सपा भी राजभर समाज से जुड़े नेताओं को पार्टी की सदस्यता दिला रही है। लेकिन इन सबके बीच सवाल यही है कि आगामी विधानसभा चुनाव में राजभर समाज का आशीर्वाद किस राजनीतिक दल के खाते में जायेगा। सवाल यह भी है कि तमाम सियासी दांव—पेंच के बीच क्या ओमप्रकाश राजभर अपनी पहचान कायम रख पायेंगे।