दिल्ली। राजनीति में अगर आपके खुद के फैसलों के कारण नुकसान होता है तो इसको गलती मानने में गुरेज नहीं करना चाहिए। सियासत में सीधा फलसफा है आदर्शवाद नगणय व नफा—नुकसान की गणित सर्वोपरि। यदि हम थोड़ा पीछे जाए तो एससीएसटी कानून का वह प्रकरण याद आता है, जिसमें न्यायालय ने माना था कि केवल आरोप लगा देने से ही सब कुछ नहीं होता है। जांच के बाद ही गिरफ्तार होनी चाहिए। कोर्ट के इस रुख को पलटने के लिए मोदी सरकार संसद का सहारा ली। उस समय इसको लेकर लोगों में काफी नाराजगी देखने को मिली। इस नाराजगी के ठोस कारण हैं, ग्राउंड रियल्टी यही है कि एससीएसटी कानून का दुरुपयोग भी होता है। यही कारण है कि जो गैर दलित वर्ग हैं, वह हमेशा आशंकित व भयभीत रहते हैं। हालांकि दलितों के अधिकार की रक्षा के लिए इस कानून को अस्तित्व में लाया गया था लेकिन इसके दूसरे पहलू की ओर ध्यान नहीं दिया गया। लेकिन कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद भी जब उस दौर में मोदी सरकार इस कानून के पक्ष में मजबूती से खड़ी नजर आई तो लोगों का काफी रिएक्शन देखने को मिला था। इसका नुकसान भाजपा को सियासी रूप से हुआ था। मध्य प्रदेश, राजस्थान समेत कई राज्यों में भाजपा को हार मिली। आज भी लोगों का कहना है कि कानून ऐसा होना चाहिए, जिससे दलितों के अधिकारों की सुरक्षा हो सके लेकिन उसमें ऐसी संभावना नहीं होनी चाहिए, जिसके जरिये गैर दलितों को नाहक प्रताड़ित किया जा सके। अब दूसरी गलती मोदी सरकार की कृषि कानूनों को लेकर देखी जा रही है। अब बहस इस बात पर करना बेमानी है कि कृषि कानून किसानों के हित में हैं या नहीं बल्कि हमें यह देखना चाहिए कि इस प्रकरण में मोदी सरकार किसानों का भरोसा जितने में विफल रही। यह अविश्वास की खाई अब जाटलैंड यानी पश्चिमी उप्र में देखने को मिल रही है, जहां जाटों की बाहुल्यता है। उप्र के बीते विधानसभा चुनाव में जाटलैंड में भाजपा को अभुतपूर्व समर्थन मिला था। वहीं उप्र में आगामी विधानसभा चुनाव सिर पर है लेकिन जाटों के अंदर नाराजगी देखने को मिल रही है। हालांकि भगवा खेमे की ओर से जाटलैंड में डैमेज कंट्रोल का प्रयास किया जा रहा है लेकिन सवाल यह है कि आखिर भगवा खेमा इसका आंकलन पहले ही करने में फेल क्यों रहा। कहीं यह मोदी सरकार की दूसरी गलती तो नहीं न है…।