दिल्ली। किसान आंदोलन को लेकर मोदी सरकार काफी कन्फ्यूज नजर आ रही है। अब तक कई आंदोलनों को टांय—टांय, फिस्स कर चुकी मोदी सरकार किसान आंदोलन को लेकर असहज नजर आ रही है। न तो वह सख्ती दिखा पा रही है और न ही झुक पा रही है। इसके कारण सरकार के नजरिये में स्पष्ट रूप से भ्रम की स्थिति नजर आ रही है। जब पंजाब में किसान आंदोलन शुरू हुआ तो भगवा खेमे के रणनीतिकार इस बात को लेकर ज्यादा गंभीर नहीं हुए कि वैसे भी वहां पर भाजपा का कोई विशेष जनाधार या प्रभाव नहीं है। लेकिन हरियाणा व पश्चिमी यूपी में किसान आंदोलन का विस्तार होने के बाद मोदी सरकार के माथे पर बल पड़ता हुआ नजर आ रहा है। हरियाणा में भाजपा की सरकार है, ऐसे में यदि लंबे समय तक आंदोलन चला तो चुनाव के दौरान पार्टी को इसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। यही हाल पश्चिमी यूपी का है। राकेश टिकैत के आहृान पर मुजफ्रनगर व पश्चिमी यूपी के अन्य जनपदों में महापंचायत के बाद सियासी समीकरण भी प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है जो कि यूपी सरकार के लिए खतरे की घंटी है क्योंकि आगामी विधानसभा चुनाव में ज्यादा समय नहीं रह गया है। पश्चिमी यूपी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इस क्षेत्र को जाट बाहुल्य माना जाता है। सपा सरकार के दौरान मुजफ्रनगर में हुए सांप्रदायिक दंगों के बाद ग्राउंड स्तर पर जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ था और इसका सीधा लाभ भाजपा को मिला था। लेकिन राकेश टिकैत के आंसुओं व महापंचायत के बाद अब माहौल बदला हुआ नजर आ रहा है। महापंचायत के बाद किसान आंदोलन के पक्ष में जहां एक ओर जबरदस्त तरीके का माहैल बना तो भाजपा के खिलाफ नाराजगी दिखी। देर से ही सही भाजपा के थिंक टैंक को अब इस बात का एहसास होने लगा है। यही कारण है कि खाप व महापंचयतों को मैनेज करने के लिए यूपी सरकार के कई मंत्रियों व नेताओं को जिम्मेदारी दी गई है। इनमें से ज्यादातर जाट समाज से संबंध रखते हैं। अब यह देखना ज्यादा दिलचस्प होगा कि पश्चिमी यूपी में भाजपा फिर से जाट समाज को अपने पाले में खींच पाती हैं अथवा पश्चिमी यूपी में भाजपा का खेल बिगड़ेगा। यदि पश्चिमी यूपी में भाजपा की चुनावी गणित बिगड़ी तो इसका सीधा असर आगामी विधानसभा चुनाव के यूपी फतह मिशन पर पड़ेगा और भविष्य में केंद्र की सियासत का प्रभावित होना भी तय है।