दिल्ली। अक्सर विरोधी दलों की ओर से आरोप लगाया जाता है कि जिन दलों के साथ भाजपा का गठबंधन होता है, कुछ समय बाद वे दल या तो खत्म हो जाते हैं या फिर उनका अस्तित्व धीरे-धीरे सिकुड़ता चला जाता है। खैर, बिहार की बात करते हैं। अरूणाचल में जेडीयू के 5 विधायकों के भाजपा में चले जाने के बाद जेडीयू की प्रतिक्रिया आई थी। विरोधी दलों की ओर से भी खूब चटखारे लेने का कार्य किया गया था। वहीं ताजा घटनाक्रम के तहत बिहार के सीएम नीतीश कुमार की ओर से 2 दिनों तक जेडीयू की चलने वाली प्रदेश कार्यकारिणी के पहले दिन बैठक के दौरान बयान दिया गया कि चुनाव के वक्त उन्हें पता ही नहीं चला कि उनका दोस्त कौन है और दुश्मन कौन। चर्चा है कि यह तंज भाजपा पर था। दरअसल बैठक में जेडीयू के कई प्रत्याशियों की ओर से अपनी बात को रखते हुए कहा गया कि उनकी हार के पीछे लोजपा न होकर बीजेपी है। मटिहानी विधानसभा से चुनाव हारने वाले जनता दल यूनाइटेड के प्रत्याशी बोगो सिंह ने कहा कि पूरे चुनाव में एक नारा चारों तरफ गूंज रहा था, एलजेपी-बीजेपी भाई-भाई। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि इसका खामियाजा जेडीयू को भुगतना पड़ा। जो बात सच है, उसे उठाना बेहद जरूरी है। कहा कि जेडीयू को हराने में एलजेपी से अधिक जिम्मेदारी बीजेपी है। एलजेपी का कोई वजूद ही नहीं है, वह तो पूरी प्लानिंग के तहत काम हुआ। बीजेपी वोटर ने मुझे वोट नहीं दिया। नीतीश कुमार ने कहा कि बिहार चुनाव से 5 महीने पहले ही एनडीए में सभी विषयों पर बात हो जानी चाहिए थी मगर ऐसा नहीं हुआ। बिहार में पार्टी के 45 लाख सदस्य है। इसके बावजूद चुनाव के वक्त जमीनी स्तर तक पार्टी की बातें नहीं पहुंच पाई, जिसकी वजह से पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहा। पिछले कुछ वर्षों में बिहार के लिए जो काम किया है, उसे जनता तक नहीं पहुंचा पाए।