दिल्ली। वैज्ञानिक भी इस बात को मानते हैं कि हमारी पृथ्वी की एक निश्चित जीवन अ​वधि है। इस बात को धार्मिक ग्रंथ भी पुष्ट करते हैं। सृष्टि का एक सीधा सा फलसफा है कि जिसका सृजन हुआ है, उसका पतन भी निश्चित है। धरती के इसी पतन को कयामत का दिन भी कहा जाता है। इसको लेकर हॉलीवुड के कई फिल्मों में बेहद प्रभावशाली ढंग से दर्शाया गया है। वहीं मानव के अंदर भी कयामत को लेकर हमेशा कौतूहल रहता है। लोग यह जानने को उत्सुक रहते हैं कि आखिर कयामत का दिन कब आयेगा और उस दिन क्या होगा। विशेषज्ञों का मानना है कि कयामत का दिन विज्ञान की कोई परिकल्पना न होकर एक वैज्ञानिक तथ्य है। हालांकि धरती कयामत के दिन से अभी 3 करोड़ वर्ष पीछे चल रही है। विशेषज्ञों के अनुसार प्रत्येक 2.7 करोड़ साल बाद धरती पर कोई न कोई प्रलय आता रहता है। आखिरी प्रलय 6.6 करोड़ साल पहले आया था, जिसमें एक ऐस्टराइड यानी धूमकेतु के गिरने के कारण डायनोसार जैसे विशालकाय जीव का धरती से अस्तित्व समाप्त हो गया था। इस लिहाज से धरती अभी प्रलय के समय से काफी पीछे चल रही है। धरती पर प्रलयकारी घटनाएं जैसे उल्कापिंडों का गिरना या फिर किसी विस्फोट का होना एक साइकल में चलता है। नये स्टेटिस्टिकल अनैलेसिस के जरिये अमेरिकी शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि विनाशकारी घटनाओं के लिए होने वाली धूमकेतुओं की बारिश 2.6 से लेकर 3 करोड़ साल पर होती है, जब ये आकाशगंगा से गुजरते हैं। यदि ये धरती से टकरा जाते हैं तो इससे दिन में ही अंधेरा छा जायेगा। जंगलों में आग लग जायेगी। एसिड की बारिश होने लगेगी और ओजन की परत पूरी तरह से तबाह हो जायेगी। इस प्रलयकारी घटना से धरती पर रहने वाले व समुद्र में रहने वाली समुद्री जीव हमेशा के लिए समाप्त हो जायेंगे। एक शोध के अनुसार अभी तक जमीन व पानी पर एक साथ 8 प्रलयकारी घटनाएं तब घटित हुईं, जब धरती के अंदर मौजूद लावा बाहर निकलकर आ गया। इस घटना के कारण जहरीली ग्रीनहाउस गैसें पैदा हुईं, जिससे धरती पर मौजूद आक्सीजन की मात्रा कम हो गई और जीवन समाप्त हो गया। न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के प्रोफेसर व शोध के लेखक माइकल रैम्पीनो के अनुसार ऐसा प्रतीत होता है कि किसी वस्तु के टकराने का बड़ा प्रभाव पृथ्वी के भीतर होने वाली आतंरिक गतिविधि, जिससे लावा बाहर आता है, ये 2.7 करोड़ साल के अंतर पर आ सकता है।