वाराणसी। गिरमिटिया…। यह एक ऐसा शब्द है, जिससे युवा पी़ढ़ी अवगत भी नहीं होगी। ब्रिटिश हुकूमत के दौरान अंग्रेजों ने भारत के मजदूरों को अपने दूसरे उपनिवेश देशों में बतौर मजदूर भेजा, वहीं से गिरमिटिया शब्द की शुरूआत हुई। यही से गिरमिटिया शब्द अपने अस्तित्व में आया। अधिकांश गिरमिटिया की जड़ यूपी, बिहार से जुड़ी हुई है। ब्रिटिया शासनकाल के दौरान इन्हें मारीशस, फिजी व अन्य अफ्रीकी देशों में भेजा गया। उस दौर के मजदूर गिरमिटिया की पहचान से अपने सफर की शुरूआत करके कई देशों में सत्ता की शीर्ष तक पहुंचे। प्रधानमंत्री जैसे ताकतकवर पद को भी उन्होंने सुशोभित किया। सबसे बड़ी बात यह है कि विदेश में रच व बस जाने के बाद भी इन्होंने अपनी संस्कृति को बिसराने का कार्य नहीं किया। यही कारण है कि आज भी मारीशस व फिजी जैसे देशों में भोजपुरी बोली जाती है बल्कि मारीशस की पहचान ही मिनी भोजपुरिया अंचल के रूप में होती है। यह पूरी तस्वीर भोजपुरिया माटी के पुरूषार्थ को दर्शाता है कि कैसे विदेश में जाकर भी फर्श से लेकर अर्श तक का सफर तय किया जा सकता है। इसी क्रम में प्रवासी भारतीय समारोह में मारीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद जगन्ना शिरकत किए। भाइयों, बहनों, मित्रों सबको नमस्ते, इस पवित्र नगरी में दुनिया के कोने-कोने से आए प्रवासी भारतीयों व काशीविासयों को मेरा प्रणाम, कुछ इसी प्रकार के संबोधन से उन्होंने अपनी बात की शुरूआत की। उनके इस भावनात्मक संबोधन के कारण पूरा कार्यक्रम स्थल ताड़ियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उन्होंने अपनी बात को भोजपुरी भाषा में रखा। रोटी-बेटी, गाय-गोरू, पूरब से संबंध, अतीत की स्मृतियां, भावनाओं की डोर आदि का जिक्र उन्होंने काफी भावपूर्ण तरीके से किया। आपके लिए यह जानना जरूरी है कि उनके पूर्वज उप्र के बलिया जनपद के मूल निवासी थे। उनके पिता अनिरूद्ध जगन्नाथ भी मारीशस के प्रधानमंत्री व राष्ट्रपति जैसे पद पर रह चुके हैं। बलिया जनपद के रसड़ा के अठिलपुरा गांव में उनके पुरखों की जड़ है। ग्रामीणों के अनुसार प्रविंद जगन्नाथ के दादा विदेशी यादव व भाई झुलई यादव को अंग्रेजों ने 1873 में गिरमिटिया मजदूर के रूप में जहाज से गन्ने की खेती के लिए मारीशस भेजा था।

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