दिल्ली। कला की अभिव्यक्ति के नाम पर फिल्म इंड्रस्टीज नग्नता, फूहड़पन, अश्लीलता व हिंसा को बढ़ावा देने वाला माध्यम बन चुका है। मुख्य रूप से बॉलीवुड व भोजपुरी फिल्म इंड्रस्टीज में अश्लीलता, नग्नता व फूहड़ता को जोरशोर से परोसा जा रहा है। कला की अभिव्यक्ति के नाम इतनी आजादी भी नहीं दी जा सकती है कि मर्यादा व नैतिकता के हर बंधन को तार—तार कर दिया जाए। भोजपुरी के कई गीत ऐसे होते हैं कि जिनके अर्थ द्धिअर्थी होते हैं। कुछ भोजपुरिया गायक इससे भी आगे निकलकर पूरी तरह से फूहड़ता को फैलाने का ठेका तक ले चुके हैं। इन गीतों को कोई भी अपने परिवार संग नहीं सुन सकता है, इनके बोल इस हद तक भद्दे होते हैं। यही हाल बॉलीवुड का है। इस इंड्रस्टीज की ओर से नग्नता व अश्लीलता को बढ़ावा दिया जा रहा है। जाहिर सी बात है कि समाज में बढ़ी अपराधिक घटनाओं के पीछे अप्रत्यक्ष रूप से फिल्मों की नग्नता, फूहड़पन, अश्लीलता व हिंसा काफी हद तक जिम्मेदार हैं। कम समय में दौलत व शोहरत पाने की होड़ में जिस्म की नुमाईश करने की होड़ मची हुई है। यदि कोई प्रेमी युगल आपत्तिजनक में किसी सार्वजनिक स्थान पर मिल जाता है तो तुरंत उसके खिलाफ अश्लीलता फैलाने का मुकदमा दर्ज किया जाता है लेकिन जिन फिल्मों के माध्यम से नग्नता की पूरी नदी बहाई जा रही है, उनके खिलाफ शिकंजा कसने के लिए कोई कवायद नहीं की जाती है। ऐसी फिल्में व गाने हमारी युवा पीढ़ी को पथभ्रष्ट करने का काम कर रही हैं। क्या हम अश्लीलता व हिंसा के सहारे समाज को सकारात्मक व रचनात्मक संदेश देने में कामयाब हो पायेंगे। क्या फूहड़ता व जिस्म की नुमाईश के बल पर हम विश्व गुरु बन सकते हैं। कला व कलाकारों को आजादी के नाम पर खुलेआम देह प्रदर्शन का लाइसेंस कैसे दिया जा सकता है। क्या फूहड़ता व अश्लीलता ही कला व कलाकारों की आजादी का प्रतीक है। ये तमाम ऐसे सवाल हैं जिन पर हम सभी को सोचना होगा। जब सबके लिए मर्यादा की लकीर है तो फिर इनके लिए क्यों नहीं।