गाजीपुर। नाम डा. विजय यादव। परिचय — कृष्ण सुदामा इंस्टीयूशन्स ग्रुप के चेयरमैन। सियासी पहचान — भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश मंत्री। जी, पंचायत चुनाव से पूर्व तक डा. विजय यादव की यही पहचान थी। लेकिन पंचायत चुनाव के परिणाम के बाद इस पहचान का कद काफी बढ़ गया है। जिस विजय यादव को सियासी पंडित राजनीति के खेल में नया—नवेला व नौसिखुआ खिलाड़ी समझ रहे थे, वह उनकी राजनीतिक चतुराई व सियासी कौशल से हतप्रभ हैं। अब तो राजनीतिक विश्लेषक भी मानने लगे हैं कि डा. विजय यादव राजनीति के खेल के मंझे हुए खिलाड़ी हैं। डा. विजय यादव ने पंचायत चुनाव में अपनी सियासी क्षमता का लोहा विरोधियों को मनवा दिया है। जिसके बाद विरोधी भी दबी जुबां से कह रहे हैं कि वह जिले की राजनीति के सिकंदर के रूप में उभरे हैं। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के तहत मनिहारी पंचम से डा. विजय यादव ने अपनी पत्नी वंदना यादव को जिला पंचायत सदस्य की सीट पर उतारा था। वंदना यादव के चुनाव लड़ने से पूर्व ही विरोधियों ने फिल्डिंग सजाने में कोई कोर—कसर नहीं छोड़ा। डा. विजय यादव को घेरने के लिए विरोधियों की ओर से पूरी तरह से सियासी चक्रव्यूह रच दिया था। इस चक्रव्यूह के रचनाकार के रूप में जिले के नामचीन धुरंधर शामिल थे। चक्रव्यूह की रणनीति के तहत विरोधियों की मंशा थी कि वंदना यादव का पर्चा ही खारिज करा दिया जाए ताकि वह चुनाव मैदान में ही न उतरें। विरोधी इस बात से अच्छी तरह से वाकिफ थे कि अगर वंदना यादव चुनाव में आती हैं तो लड़ाई काफी कठिन होगी। इसीलिए उनका पर्चा खारिज कराने की नाकाम कोशिश की गई। डा. विजय यादव ने अपनी सियासी कौशल का परिचय देते हुए विरोधियों के इस दांव को फेल कर दिया। इसके बाद डा. विजय यादव व उनकी पत्नी वंदना यादव के खिलाफ दूसरा चक्रव्यूह सियासी मैदान में रचा गया। सियासी मैदान में सपा, बसपा, सुभासपा से लेकर निर्दल प्रत्याशी तक चुनौती देने के लिए उतर गये। डा. विजय यादव को सियासी रूप से डैमेज करने के लिए उनके स्वजातीय उम्मीदवार को भी मैदान में उतारा गया। लेकिन इन सब घेराबंदी के बीच डा. विजय यादव निकले मंझे हुए खिलाड़ी, उन्होंने अपनी शानदार सियासी रणनीति का परिचय देते हुए भाजपा के बैनर को फ्रंटफुट पर नहीं रखा ताकि गैर भाजपा वोटर भी उनके साथ जुड़ सकें। उनकी यह रणनीति ने कमाल कर दिया और विरोधी मुंह के बल गिर पड़े। वंदना यादव की शानदार जीत हुई। हालांकि डा. विजय यादव की इस रणनीति को सोशल मीडिया पर मुद्दा बनाने की भी कोशिश की गई ताकि भाजपा के अंदर उनकी छवि को बट्टा लगाया जा सके। सोशल मीडिया पर बकायदे प्रचारित किया गया कि वह भाजपा के उम्मीदवार होने के बाद भी भाजपा के बैनर को पीछे कर रहे हैं। लेकिन उनके खिलाफ यह दुष्प्रचार भी काम नहीं आया। भाजपा नेतृत्व भी उनकी रणनीति से सहमत दिखा। भाजपा नेतृत्व को यह अच्छी तरह से पता है कि कितनी कठिन सियासी जंग के बीच डा. विजय यादव शानदार जीत दर्ज करते हुए भाजपा के जीते हुए सीटों की संख्या में एक सीट बढ़ाने का काम किये हैं। ऐसी रणनीति भाजपा का हाईकमान खुद कई राज्यों के चुनाव में अपना चुका है। वैसे कहा जाता है कि जंग व मुहब्बत में सब जायज है। शर्त एक ही है कि विजय होना चाहिए और वह चीज डा. विजय यादव ने करके दिखा दिया है। अब बारी है जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी का। पंचायत चुनाव में अपने प्रदर्शन से निराश भाजपा को जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने के लिए डा. विजय यादव के रूप में एक उम्मीद की किरण दिखाई दे रही है। इस प्रतिष्ठापरक चुनाव को अपने नाम करके भाजपा अपने जख्म को भरने की पूरी कोशिश करेगी। जाहिर सी बात है इस चुनाव के लिहाज से भाजपा को डा. विजय यादव से बेहतर सेनापति व सियासी योद्धा कोई और नहीं मिल सकता है।


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