दिल्ली। विरासत में आपको सियासत मिल सकती है लेकिन उसको बरकरार रखना व आगे बढ़ाने यह आपके बुद्धि कौशल व पुरुषार्थ पर निर्भर करता है। यदि विरासत में एक अच्छी सियासी प्लेटफार्म मिल रहा है तो इसकी कोई गारंटी नहीं है कि आप अपने परंपरागत मुकाम को बनाकर रख सकते हैं। यह सब कुछ आपकी क्षमता व भाग्य दोनों पर निर्भर करता है। कुछ ऐसा ही मामला चिराग पासवान का है। चुनाव परिणाम से आने से पूर्व ही उनके पिता रामविलास पासवान यह सटीक विश्लेषण कर लेते थे कि बिहार में किस पार्टी की सरकार आने वाली है। उनकी इसी विशेषता के कारण उनको सियासी क्षेत्र का मौसम वैज्ञानिक भी कहा जाता था। वहीं बिहार चुनाव में चिराग पासवान सुर्खियों में रहे। जिस प्रकार से वह अपने आपको इस चुनाव में प्रस्तुत कर रहे थे, उससे लग रहा था कि वह राज्य में अपनी पार्टी के जरिये प्रभावशाली भूमिका निभायेंगे। हर कोई उनके रूप में भविष्य का चमकता हुआ सितारा देख रहा था लेकिन आज स्थित बिल्कुल विपरीत है। आज वह अलग—थलग नजर आ रहे हैं। चुनाव के दौरान उन्होंने नीतीश कुमार के खिलाफ एकतरफा मोर्चा खोल दिया था। आज स्थिति यह है कि कई नेता व कार्यकर्ता पार्टी छोड़ रहे हैं या फिर नीतीश कुमार की पार्टी में शामिल हो रहे हैं। नीतीश कुमार भी चुनाव के वक्त चिराग के रवैये को भूले नहीं हैं, यही कारण है कि वह भाजपा पर पूरी तरह से दबाव बनाये हुए हैं कि चिराग से दूरी बनाकर रखी जाए। हालात यह है कि चुनाव के वक्त चिराग जिस प्रकार से खुद को मोदी का हनुमान बताते थे, आज भाजपा भी उनसे दूरी बना रही है क्योंकि वह चिराग के चक्कर में नीतीश कुमार को नाराज करके बिहार की सत्ता से बेदखल नहीं होना चाहती है। इसका प्रमुख कारण चिराग पासवान की सियासी अनुभवहीनता को ही जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। चिराग पासवान को इस बात को समझने की जरूरत है कि सियासत में जो मुकाम उनको अपने पिता के जरिये मिला है, उसको बनाने में रामविलास पासवान को काफी संघर्ष व एक लंबी राजनीतिक यात्रा तय करनी पड़ी थी। किसी भी मुकाम को एक झटके व शार्टकट के जरिये नहीं पाया जा सकता है बल्कि उसके लिए धैर्य की जरूरत होती है। यदि रामविलास पासवान जीवित होते तो निश्चित रूप से चिराग व लोजपा की यह स्थित आज नहीं होती। चिराग को उम्मीद थी कि पिता की मृत्यु से रिक्त राज्यसभा सीट पर मां रीना पासवान को भेजा जायेगा लेकिन ऐसा होता दिखाई नहीं दे रहा है। माना जा रहा है कि इसको लेकर नीतीश कुमार की आपत्ति है क्योंकि चुनाव के वक्त चिराग की ओर से दिये गये सियासी जख्म को वह भूले नहीं हैं। यह भी कहा जा रहा है कि नीतीश कुमार के दबाव के कारण भविष्य में चिराग व उनकी पार्टी एनडीए का हिस्सा भी नहीं रहेगी।।

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