दिल्ली। दक्षिण भारत के केरल विधानसभा चुनाव इस बार दिलचस्प होने जा रहा है। पूरे देश से राजनीतिक रूप से हाशिये पर जा चुकी लेफ्ट की कोशिश है कि कम से कम यहां पर अपने अस्तित्व को बचाकर रखा जाए। वहीं कांग्रेस की ओर से भी संभावनाओं की तलाश की जा रही है। यही कारण है कि राहुल गांधी सक्रिय नजर आ रहे हैं। दूसरी तरफ इस बार भगवा खेमा दक्षिण के केरल में कमल खिलाने के लिए विशेष रणनीति बनाया है। भाजपा की इस सियासी रणनीति के केंद्रबिंदु में ईसाई हैं। चूंकि केरल का धार्मिक समीकरण अन्य जगहों की तुलना में थोड़ा अलग है, इसीलिए भाजपा की ओर से अपनी रणनीति में ईसाई समाज को केंद्र में रखा गया है। अब तक पहचान भाजपा की पहचान हिंदुत्व की राजनीति की रही है। लेकिन केरल में इसमें परिवर्तन नजर आयेगा। भाजपा की सियासी रणनीति के तहत ईसाई व हिंदू समाज का समीकरण तैयार करने की कोशिश की जा रही है। चूंकि केरल में 18.5 प्रतिशत वोटर ईसाई हैं, इसीलिए भाजपा की रणनीति है कि अगर हिंदुओं के साथ ईसाई वोटरों का साथ उसे मिल जाए तो कमल खिल जायेगा। लेकिन किसी भी समीकरण व रणनीति को ग्राउंड पर मूर्त रूप देने के लिए किसी आधार या मुद्दे की जरूरत होती है, भाजपा की ओर से इसकी भी तलाश कर ली गई है। असल में हाल ही के दिनों में पूरे देश में एक मुद्दे को चर्चा में लाया गया, वह मुद्दा है लव जिहाद। लेकिन यह चर्चा में आया क्यों क्योंकि इसको लेकर यूपी, मध्य प्रदेश, हरियाणा आदि भाजपा शासित प्रदेशों की ओर से कानून बनाने की घोषणा की गई। कानूनी शक्ल में इसका नाम धर्मांतरण विरोधी कानून दिया गया लेकिन सियासी भाषणों में सियासतदान इसका जिक्र लव जिहाद के तौर पर करते हैं। लेकिन लव जिहाद जो कि इन दिनों पूरे देश में सियासी बयानों से लेकर सोशल मीडिया तक में सुर्खियों में बना हुआ है, आप जानते हैं, यह शब्द पहली बार कहां से अस्तित्व में आया। दरअसल सबसे पहली बार इसकी चर्चा केरल में हुई। केरल में यह मामला लंबे समय से चल रहा है, इन दिनों यह मुद्दा काफी बड़ा हो गया है। यही कारण रहा कि बीते दिनों जब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ केरल पहुंचे तो उन्होंने इसका जिक्र किया और वहां के सीएम पर निशाना साधा। असल में ईसाई समाज कई बार इस मुद्दे को लेकर अपनी चिंता जाहिर कर चुका है। वहीं एक मामला वहां पर धार्मिक स्तर पर जनसंख्या असंतुलन का भी है। ईसाई समाज का मानना है कि एक धर्म विशेष की जनसंख्या तेजी से बढ़ी है और वह प्रभावित हो रहे हैं। यानी भाजपा को बैठे—बैठे, उसकी राजनीति के हिसाब से मुफीद मुद्दे मिल चुके हैं। यही कारण है कि केरल में भाजपा की ओर से इन मुद्दों को लगातार उछाला जा रहा है और ईसाई मतदाताओं को साधकर कमल खिलाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी गई है। टाम वडक्कन केरल में भाजपा के बड़े नेताओं में शुमार हैं। उनके सहारे भाजपा ईसाई समाज का विश्वास जीतने की कोशिश कर रही है। भाजपा को उम्मीद है कि जिस प्रकार से यूडीएफ व एलडीएफ की ओर से तुष्टिकरण की राजनीति की जा रही है, उसके कारण ईसाई समाज भाजपा को विकल्प के रूप में जरूर देखेगा। वहीं भाजपा की ओर से टाम वडक्कन को राष्ट्रीय प्रवक्ता बनाकर ईसाई समाज को सकारात्मक संदेश देने की कोशिश की गई है। जनवरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ईसाई समुदाय के तीन मुख्य पादरियों से मुलाकात भी किए थे। वार्ता के दौरान उन्होंने ईसाई समुदाय की समस्याओं के समाधान को लेकर आश्वस्त किया था। यदि धार्मिक नजरिये से केरल की सियासत को समझने की कोशिश की जाए तो 54.7 प्रतिशत हिंदू, 26.7 प्रतिशत मुस्लिम व 18.5 प्रतिशत ईसाई समुदाय है।

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