कानपुर। सरकारी सेवा में कार्यरत लोगों के उपर भी धार्मिकता इस कदर हावी रहती है कि वह दूसरों को भी संविधान के बजाय धार्मिक तरीके अपनाने की सलाह देते हैं। वह भी जब उक्त प्रकरण को लेकर बकायदे संविधान के तहत कानून बना हो। यह अपने आप में कट्टरपंथी सोच को परिलक्षित करता है, जहां कानून व संविधान के लिए कोई सम्मान नहीं है। मामला तीन तलाक देने पर दर्ज कराये गये मुकदमे से संबंधित है। पीड़िता की ओर से विवेचक के उपर गंभीर आरोप लगाये गये हैं। आरोप है कि दरोगा ने मामले में कार्रवाई के बजाय कहा कि तीन तलाक कानून में क्या रखा है, शरीयत की मानो। इस प्रकरण में सीओ बाबूपुरवा की ओर से जांच के आदेश दिये गये हैं। सुजातगंज की हिना परवीन के अनुसार उसका निकाह पांच जुलाई 2019 को चाचा नेहरू कालोनी, अजीतगंज के सलीम शहजादे के पुत्र नूरजादे उर्फ ईशान से हुआ था। निकाह के बाद वह सउदी कमाने के लिए चला गया। 27 अक्तूबर 2019 को सउदी से ही उसने तीन तलाक दे दिया। जिसको लेकर चार नवंबर 2019 को मुकदमा दर्ज करवाया गया। पति, ससुर, सास, देवर, ननद व ननदोई को आरोपित बनाया गया। बतौर विवेचक सुजातगंज चौकी प्रभारी मंसूर अहमद को जांच की जिम्मेदारी दी गई। उन्होंने छह माह तक कोई कार्रवाई नहीं की। बाद में मंसूर का स्थानांतरण होने पर नये विवेचक की ओर से पति को गिरफ्तार किया गया। हिना की ओर से सीओ से शिकायत की गई कि पूर्व विवेचक शरीयत को मानने वाले थे। उन्होंने यह भी शिकायत की कि पूर्व विवेचक ने पति को छोड़कर अन्य आरोपियों के नाम जांच से निकाल दिये थे। फिलहाल पूरे मामले की जांच की जा रही है।