दिल्ली। इन दिनों नेपोटिज्म शब्द सबसे अधिक चर्चाओं में है। यह शब्द सबके प्रकाश में बार—बार आ रहा है। बहुतेरे लोगों को इसका अर्थ पता नहीं होगा लेकिन वे भी बातचीत के दौरान इसका प्रयोग करने से नहीं चूक रहे हैं। सरल शब्दों में कहें तो नेपाटिज्म मतलब किसी क्षेत्र में अपने रिश्तेदारों व जान—पहचान वालों को संरक्षण देना और बाहरी लोगों को वहां से जाने के लिए विवश करना। नेपोटिज्म को लेकर इन दिनों मीडिया की ओर से बॉलीवुड को निशाने पर लिया गया है। मसला एक्टर सुशांत सिंह की मौत का है। एक चीज समझने की जरूरत है कि नेपोटिज्म हर एक क्षेत्र में मौजूदा दौर में है। काफी समय से प्राइवेट क्षेत्रों में ज्यादा व्यापक स्तर पर नेपोटिज्म विद्यमान है। सियासत लेकर प्राइवेट नौकरी तक का क्षेत्र इससे बचा नहीं है। ऐसे में नेपोटिज्म को लेकर केवल एक क्षेत्र बॉलीवुड की बात करना बेमानी होगी। यदि नेपोटिज्म चर्चा का विषय बन रहा है तो इसके संदर्भ में सभी क्षेत्रों को लेना होगा, तभी समग्रता व व्यापकता आ सकती है अन्यथा चर्चा व विमर्श आधी—अधूरी ही रहेगी।
लेकिन सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस मुख्यधारा की मीडिया की ओर से आज नेपोटिज्म का सवाल उठाया जा रहा है, कभी उस मीडिया की ओर से अपने क्षेत्र में विद्यमान नेपोटिज्म को लेकर कोई चर्चा नहीं की गई। दरअसल जानते हैं देश की मुख्यधारा की मीडिया की कहानी जलते हुए दीपक की तरह है। जैसे दीपक प्रकाश करके अपने आसपास के अंधेरों को मिटाने का कार्य तो करता है लेकिन दीपक तले अंधेरा तो बना ही रहता है। ठीक उसी तरह मुख्यधारा की मीडिया की ओर से देश के सभी संस्थानों व क्षेत्रों को आईना दिखाने का काम किया जाता है लेकिन खुद की कमियों के बारे में कभी भी बेबाकी से चर्चा करने का काम नहीं किया जाता है। आखिर मीडिया को लेकर चर्चा क्यों न हो। यह एक बड़ा प्रश्न है। माना कि मीडिया देश का चौथा स्तंभ है लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि इसके उपर सवाल उठाने व कमियों को दुरुस्त करने का अधिकार भी नहीं है। यदि मीडिया के अंदर कमियां व गंदगी विद्यमान है तो उस पर भी बात होनी चाहिए। जो लोग मुख्यधारा की मीडिया में कार्य किए हैं, वे इस बात को बखूबी जानते होंगे कि इस क्षेत्र में किस तरह से जातिवाद है। प्रिंट मीडिया के बड़े पदों पर एक जाति विशेष का कब्जा है। मीडिया में नेपोटिज्म, जातिवाद का खूब बोलबाला है। बड़े मीडिया हाउस की ओर से दूसरों की शोषण को लेकर मसालेदार खबर बनाने का काम किया जाता है लेकिन वे जब अपने कर्मियों का अंतहीन शोषण करते हैं तो उसके बारे में जमाने को भनक तक भी नहीं लग पाती है। आखिर मीडिया का यह दोहरा रवैया क्यों।

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