दिल्ली। लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के एक मजबूत स्तंभ। जब—जब बिहार की राजनीति की बातें होंगी तो वह लालू प्रसाद के बगैर अधूरी रहेंगी। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिहार की राजनीति में लालू प्रसाद के मायने क्या हैं। भ्रष्टाचार, घोटाला तमाम ऐसी बातें लेकिन इसके बाद भी लालू प्रसाद की शख्सियत का एक ऐसा हिस्सा, जिसके कारण बिहार में पिछड़ों को राजनीतिक शक्ति मिली। यदि चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता राजद प्रमुख लालू प्रसाद की पिछड़ा राजनीति के बारे में विस्तार से जानकारी हासिल करनी हो तो इसके लिए मंदिर आंदोलन के दौर में जाना पड़ेगा। जिस समय उप्र के अयोध्या में राममंदिर आंदोलन का असर पूरे देश में था। वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण अडवाणी की ओर से रथयात्रा निकाली जा रही थी। भाजपा की कमंडल की राजनीति के कारण मंडल की राजनीति का तानाबाना धीरे—धीरे खत्म होने के कगार पर था, उस वक्त पूरे देश में एकमात्र राजनेता लालू प्रसाद ही थे, जो कि मोर्चा संभाले थे। लालकृष्ण अडवाणी की रथयात्रा पूरे देश में निकली लेकिन बिहार में लालू प्रसाद यादव ने उसे रोककर दिखाया। यह लालू प्रसाद की शख्सियत का ही कमाल था कि पूरे देश में उस वक्त कमंडल की राजनीति का असर दिख रहा था लेकिन बिहार में मंडल की राजनीति पर कमंडल भारी नहीं हो पाया। उस पल को भी याद कीजिए जब आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत की ओर से आरक्षण हटाने को लेकर बयान दिया गया, सबसे पहले व मुखर विरोध लालू प्रसाद ने किया। उन्होंने एक तरह आरएसएस को चैलेंज करते हुए बयान दिया कि देश में किसी की हिम्मत नहीं है कि आरक्षण को समाप्त कर दे। जिसके बाद पूरे देश में राजनीतिक घमासान बढ़ा। भाजपा—आरएसएस को भी एहसास हुआ कि इससे पिछड़ा समाज पूरे देश में उससे छिटक सकता है। अंतत: इस बयान से पीछे हटना पड़ा। विरोधी लालू प्रसाद को लेकर तमाम नकारात्मक बातें करें लेकिन सच्चाई यह भी है कि बिहार के अंदर लालू प्रसाद के कारण पिछड़ों में राजनीतिक चेतना का आगाज हुआ। यह उनकी शानदार राजनीति की विशेषता है​ कि वर्षों से बिहार की राजनीति में पिछड़ा समाज राजनीतिक शक्ति के रूप में केंद्रबिंदु बना हुआ है। लगातार बिहार के सीएम पद पर पिछड़े समाज का कब्जा बरकरार है। भाजपा व आरएसएस की ओर से हिंदुत्व के नाम पर इसको खत्म करने की तमाम कोशिशें की गईं लेकिन सफलता हाथ न लगी। भाजपा आज भले ही बतौर सहयोगी बिहार की सत्ता पर काबिज है लेकिन सत्ता की कमान तो नीतीश कुमार के ही हाथों में है। इन सबके लिए लालू प्रसाद की राजनीतिक योगदान को नजरंदाज नहीं किया जा सकता है। बिहार में सियासी जमीन पर पिछड़ों के नायक के तौर लालू प्रसाद की जो भूमिका है अब तक उस दिशा में कोई प्रभावशाली व्यक्तित्व उभरता हुआ दिखाई नहीं दे रहा है। भविष्य में क्या वाकई कोई सियासतदान इस जगह पर खुद को स्थापित कर पायेगा या फिर अन्य राज्यों की तरह यहां पर भी ​भाजपा व आरएसएस अपने एजेंडे में कामयाब हो जायेंगे, ये तमाम ऐसे सवाल हैं, जिनके जवाब अभी मिलना मुश्किल है।