दिल्ली। भारत एक ऐसा देश है जहां प्रत्येक धर्म के लोगों को पूरी आजादी व सम्मान के साथ जीवन यापन करने का मौका दिया जाता है। बावजूद इसके यहां पर कुछ लोगों द्वारा असहिष्णुता, अल्पसंख्यकों पर अत्याचार व संविधान के खतरे में होने की बात बताई जाती है। जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है। यदि ऐसा होता तो यहां अल्पसंख्यकों की आबादी दिन—प्रतिदिन बढ़ती नहीं जाती। दूसरी तरफ पाकिस्तान, बांग्लादेश की तरह अफगानिस्तान में भी हिंदुओं व सिक्खों की आबादी लगातार घट रही है, वह भी काफी तेजी से। पाकिस्तान में 1947 में हिंदुओं की आबादी 23 प्रतिशत थी जो मौजूदा वक्त में महज डेढ़ फीसद ही है। अधिकांश हिंदुओं व सिक्खों का कत्लेआम कर दिया गया। आये दिन दिनदहाड़े उनकी बहन—बेटियों का जबरदस्ती अपहरण करके धर्मपरिवर्तन करा दिया जाता है। कइयों को जिस्मफरोशी के धंधे में धकेल दिया जाता है। यानी पाकिस्तान में हिंदुओं व सिक्खों की जिंदगी पूरी तरह से नारकीय है। इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण वहां हिंदुओं व सिक्खों की आबादी पर अस्तित्व का संकट बना हुआ है। यदि यही रहा तो जल्द ही पाकिस्तान से हिंदुओं व सिक्खों का नामो—निशां मिल जायेगा। यही हाल बांग्लादेश का भी है। दूसरी तरफ अफगानिस्तान में परेशान किए जा रहे हिंदू व सिक्ख अल्पसंख्यकों को न केवल भारत में बल्कि अमेरिका में भी समर्थन मिला है। हाउस आफ रिप्रेजेंटेटिव्स में कांग्रेस की जैकी स्पीयर द्वारा 7 अन्य लोगों द्वारा एक प्रस्ताव पेश किया गया जो कि अफगानिस्तान में उत्पीड़ित धार्मिक समुदायों को फिर से संगठित करना चाहते हैं। पिछले सप्ताह पेश किए गये प्रस्ताव में कहा गया है कि सिक्ख और हिंदू अफगानिस्तान में अल्पसंख्यक और लुप्तप्राय अल्पसंख्यक हैं। प्रस्ताव में कहा गया है कि हाल के वर्षों में सिक्खों, हिंदुओं और अफगानिस्तान में अन्य अल्पसंख्यकों के खिलाफ लक्षित हिंसा के एक बड़े पैटर्न का पालन हो रहा है। प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि इन दोनों समुदायों के सदस्यों को अमेरिकी शरणार्थी प्रवेश कार्यक्रम के तहत फिर से बसाया जायेगा। अफगान समाचार एजेंसी टोलो न्यूज के अनुसार पिछले 3 दशकों में इन 2 अल्पसंख्यक समुदायों में लगभग 99 प्रतिशत लोग अफगानिस्तान से पलायन कर चुके हैं। एक एमय अफगानिस्तान के प्राचीन शासकों ने हिंदुओं को नगण्य ​कर दिया था। जबकि सिक्खों, जिनका 500 वर्ष पुराना इतिहास है, उनकी संख्या सिर्फ 600 रह गई है। अफगानिस्तान में जिस प्रकार से कट्टरपंथी हावी है, जल्द ही ये भी पलायन कर जायेंगे। वर्तमान में अफगानिस्तान के अंदर हिंदू व सिक्ख महज 700 की संख्या में रह गये हैं। जबकि 1970 में लगभग इनकी संख्या 700000 थी। हाल ही के दिनों में अफगानिस्तान के काबुल व जलालाबाद में हिंदुओं व सिक्खों के उपर हमले हुए। इस हमले में कई सिक्खों व हिंदुओं की मौत हो गई थी। ऐसा ही एक हमला एक जुलाई 2018 को जलालाबाद में हुआ था जो कि आत्मघाती हमला था। इस हमले में 19 सिक्ख व हिंदू मारे गये थे। बीते 25 मार्च को काबुल में गरुद्वारा गुरु हर राय साहिब के हमले में 25 लोग मारे गये थे। वहीं जून में 20 अमेरिकी सीनेटरों के एक द्विदलीय समूह की ओर से ट्रंप प्रशासन से अफगानिस्तान के सिक्ख व हिंदू समुदाय को अपातकालीन शरणार्थी सुरक्षा देने का आग्रह किया गया था। धर्म अलग होने के कारण हिंदू व सिक्ख समुदाय के लोगों पर आईएसआईएस के हमले का खतरा मंडराता रहता है। आतंकवादी संगठनों व कट्टरपंथियों के निशाने पर हमेशा हिंदू व सिक्ख समुदाय के लोग रहते हैं। जिसके कारण इन दोनों समुदायों के अंदर हमेशा भय बना रहता है।