रविकांत श्रीवास्तव की कलम से बिहार की सियासी स्टोरी…





पटना। राजनीति बहुत गहरी चीज है। कई दफा आपको जो चीजें नजर आती हैं, असल में वह भ्रम होता है। सच्चाई तो पर्दे के पीछे छिपी होती है। इसीलिए कहा जाता है कि सियासत की सियासी कहानी समझना सबके बूते की बात नहीं है। इन दिनों में बिहार में छिड़े राजनीतिक संग्राम की बात ही ले लिजिए। कोविड—19 व लॉकडाउन में भी बिहार के अंदर सियासत उफान पर है। जन अधिकार पार्टी के संरक्षक व पूर्व सांसद पप्पू यादव को गिरफ्तार कर लिया गया है। जिसके कारण सोशल मीडिया से लेकर मुख्यधारा की मीडिया तक में पप्पू यादव छाये हुए हैं। यहां तक कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी उनकी कवरेज बनी हुई है। सोशल मीडिया पर बकायदे पप्पू यादव को बीते वर्ष लॉकडाउन में जनता का मददगार बताया जा रहा है, जवाब में लोगों की सहानुभूति भी जमकर मिल रही है। यानि जरा सोचिए, भाजपा की एक कार्रवाई से पप्पू यादव का सियासी कद कितना बढ़ गया है। वहीं बिहार की जमीन पर उनकी पार्टी जन अधिकार पार्टी का कितना जनाधार है, इससे सभी लोग बखूबी वाकिफ हैं। यदि बिहार की मौजूदा सियासत को समझना है तो केवल इसको आप ऐसे नहीं समझ सकते हैं कि एंबुलेंस प्रकरण में पप्पू यादव की ओर से राजीव प्रताप रुडी पर गंभीर आरोप लगाये गये फिर पप्पू यादव की गिरफ्तारी हुई। वहीं उनकी गिरफ्तारी को लेकर पहले कारण पता चला​ कि लॉकडाउन के उल्लंघन के आरोप में ऐसा किया गया। इसके बाद बताया गया कि 32 वर्ष पूर्व हुए किडनैपिंग व हत्या के मामले में कोर्ट की नोटिस के बाद ऐसा किया गया है। वहीं अब पप्पू यादव सोशल मीडिया पर पूरी तरह से छाये हुए हैं। उनके समर्थकों ने ग्राउंड पर भी जमकर बवाल काटा। यानि पप्पू यादव का सियासी कद अब इस कदर उपर उठ गया है कि वह बिहार की राजनीति से निकलकर इन दिनों राष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियां बटोर रहे हैं। सबसे मजेदार बात यह है कि गिरफ्तारी के दौरान उनको व उनके समर्थकों को इस बात की पूरी छूट प्रशासन की ओर से दी ई कि वह लाइम—लाइट में आ सकें। इस पूरे प्रकरण में एक ओर जहां पप्पू यादव को सहानुभूति मिल रही है तो दूसरी तरफ अधिकांश लोगों की ओर से सुशासन बाबू यानि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को कोसा जा रहा है। इन सब घटनाक्रमों के बीच राजद व तेजस्वी यादव नेपथ्य में जाते हुए दिख रहे हैं। लेकिन जिस एनडीए को उम्दा सियासी रणनीति बनाने के मामले में उसके विरोधी भी उसकी तारीफ करते हैं, क्या आप ऐसी उम्मीद कर सकते हैं कि पप्पू यादव के खिलाफ ऐसा कदम उठाकर वह खुद मुसीबत में पड़ जाए। ​बिहार की राजनीति के जानकारों के अनुसार यह सियासी चाल जानबूझकर व पूरी तरह से सोच—समझकर चली गई है। पप्पू यादव के सियासी कद को उभारने के पीछे मंशा राजद व तेजस्वी की राजनीति को डैमेज करना है, इसमें तात्कालिक नहीं बल्कि दूरगामी राजनीतिक लाभ देखा जा रहा है। गौरतलब हो कि माफिया व सिवान के पूर्व सांसद मो. शहाबुद्दीन की मौत को लेकर उनके समर्थकों में राजद के प्रति काफी नाराजगी देखने को मिली। शहाबुद्दीन के प्रति कोई पहल राजद की तरफ से होता न देखकर उनके समर्थकों व एक वर्ग की ओर जमकर भड़ास निकाली गई थी। समर्थकों का स्पष्ट कहना था कि शहाबुद्दीन की देन रही कि लंबे वर्षों तक राजद सत्ता में रहा। लेकिन जब शहाबुद्दीन को मदद की जरूरत पड़ तो कुछ नहीं किया गया, वक्त आने पर राजद से अब इसका हिसाब लिया जायेगा। यानि राजद के प्रति नाराजगी का संदेश स्पष्ट तौर से नजर आया। राजद के एक प्रमुख वोटबैंक में नाराजगी उभरने के बाद एनडीए के रणनीतिकारों को लगा कि क्यों न सियासी रूप से पप्पू यादव को हीरो बनाकर राजद व तेजस्वी के वाई समीकरण को भी प्रभावित कर दिया जाए।