गाजीपुर। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव को लेकर सपा की रणनीति भाजपा से बेहतर दिखी। यह बातें केवल हवा—हवाई नहीं हैं बल्कि इसके पीछे कुछ ठोस तथ्य हैं। जरा याद कीजिए त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दौरान भाजपा प्रदेश नेतृत्व की ओर से बागियों को बगावत करने पर उनके खिलाफ सख्त कदम उठाने को लेकर किस प्रकार का सख्त संदेश दिया गया था। बाद में भाजपा के कुछ कार्यकर्ता बागी होकर पंचायत चुनाव के सियासी मैदान में पार्टी प्रत्याशियों के खिलाफ ताल ठोंक दिए। चूंकि भाजपा प्रदेश नेतृत्व की ओर से पहले ही सख्ती का संकेत दे दिया गया था, लिहाजा बाद में भाजपा के जिला संगठन नेतृत्व की ओर से इनके खिलाफ कार्रवाई की गई। यह रही बात भाजपा की। अब बात करते हैं सपा की। इस मामले में सपा की रणनीति सियासी रूप से बेहतर नजर आई। कारण साफ है कि पहले सर्वसम्मति बनाने की कोशिश की गई, जहां आमसहमति हो गई, वहां पार्टी की ओर से अधिकृत रूप से प्रत्याशी को मैदान में उतार दिया गया। वहीं जहां सपा के कार्यकर्ताओं व समाजवादी विचारधारा में विश्वास रखने वाले लोगों में सहमति नहीं बन पाई, उन सीटों को फ्री फाइट के लिए छोड़ दिया गया यानि जो जितेगा वह भी सपा का और जो हारेगा वह भी अपना। यही कारण है कि जिला पंचायत सदस्य की 29 सीटें जितने के बाद भी सपा जिला नेतृत्व का दावा है 10 अन्य भी उनके लोग ही हैं क्योंकि वे लोग समाजवादी विचारधारा में निष्ठा रखते हैं। वैसे टिकट के लिए कलह तो सपा व भाजपा दोनों पार्टियों में कलह दिखी थी। लेकिन इस मामले में सपा की ओर से चतुराई भरी रणनीति का परिचय देते हुए बागियों के खिलाफ कोई कार्रवाई न करते हुए फ्री फाइट के लिए संबंधित सीटों को छोड़ दिया गया। वहीं भगवा खेमे की रणनीति ठीक इसके विपरीत रही। अब चूंकि चर्चा जिला पंचायत अध्यक्ष पद के चुनाव को लेकर है तो भाजपा के सूत्रों का कहना है कि पार्टी की ओर से जीते हुए बागियों से संपर्क करने की कोशिश की जा रही है ताकि इस कुर्सी तक पहुंचने की राह आसान हो सके। वैसे भी भाजपा महज 6 सीटों पर ही विजय दर्ज कर पाई है। अब यह देखने वाली बात होगी कि भाजपा अपने बागी नवनिर्वाचित जिला पंचायत सदस्यों को कैसे मना पाती है। इसके अलावा सत्तापक्ष की नजर नवनिर्वाचित निर्दल जिला पंचायत सदस्यों पर भी है।

0 Comments