दिल्ली। मोदी सरकार के अब तक के कार्यकाल में कभी उतनी फजीहत का सामना नहीं करना पड़ा जो इस समय करना पड़ रहा है। किसान आंदोलन मोदी सरकार के गले की फांस बन चुका है। अब तक हर आंदोलन को मोदी सरकार बेअसर करती नजर आई लेकिन इस बार किसान आंदोलन को लेकर मोदी सरकार पसोपेश में पड़ी हुई नजर आ रही है। वह न तो किसानों की मांग मान पा रही है और न ही सख्ती दिखा पा रही है। गजब की धर्मसंकट की स्थिति है। मोदी सरकार के रणनीतिकारों को यह बात अच्छी तरह से पता है कि किसान आंदोलन पर सख्ती आत्मघाती कदम साबित हो सकता है। दूसरी तरफ किसान आंदोलन की कसौटी पर अब यूपी की योगी सरकार के समक्ष भी अग्निपरीक्षा की घड़ी आ चुकी है। कल तक किसान आंदोलन का केंद्र पंजाब था लेकिन अब रुख घूमकर दिल्ली—यूपी के बार्डर गाजीपुर पर हो चुका है। अभी मुजफ्फरपुर में पंचायत हुई थी। अब किसानों की ओर से बागपत में महापंचायत करने का एलान किया गया है। जाहिर सी बात है कि अब पश्चिमी यूपी धीरे—धीरे किसान आंदोलन के रंग में रंगता हुआ नजर आ रहा है। यदि यह सिलसिला जारी रहा तो भविष्य में योगी सरकार को कानून—व्यवस्था के मुद्दे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। मालूम हो कि तीन कृषि कानून के विरोध में किसानों के समर्थन में उतरी भारतीय किसान यूनियन की मुजफ्फरनगर के बाद अब बागपत में किसान पंचायत होगी। बागपत में धारा 144 लागू होने के बाद भी किसान यहां की बड़ौत तहसील के मैदान में आज किसान पंचायत करेंगे।

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