पटना। बिहार में सियासी संग्राम अपने शवाब पर है। सभी सियासी दलों की ओर से तलवारें खींच ली गई हैं। जंग जारी है। बस चुनावी परिणाम आना बाकी है। इन दिनों सोशल मीडिया से लेकर बिहार के आबोहवा में एक चीज चल रहा है कि बिहार में का बा…दूसरी तरफ से उपलब्धियों का जिक्र करके कहा जा रहा है कि बिहार में इहे बा…। यदि पूरे प्रदेश के चुनावी जंग पर सरसरी निगाह डाली जाए तो चुनाव लालू के 15 साल बनाम नीतीश कुमार के 15 साल पर लड़ा जा रहा है। सत्ताधारी दल की ओर से विशेष रूप से इसकी तुलना की जा रही है। लोगों को यह समझाने की कोशिश की जा रही है कि आखिर बीते 15 वर्षों की अपेक्षा उनके शासनकाल का 15 वर्ष कैसे बेहतर रहा। नि:संदेह लालूराज के 15 वर्षों के अपेक्षा नीतीश कुमार के 15 वर्षों का शासनकाल संतोषजनक कहा जा सकता है। विशेष रूप से कानून—व्यवस्था व बेहतर सड़कों के निर्माण के मामले में। लेकिन बिहार की एक बड़ी समस्या जो शुरू से रही है और अभी भी है, वह मुद्दा नहीं बन पा रहा है। बिहार के युवाओं के समक्ष हमेशा रोजगार की समस्या रही है। बेरोजगारी के कारण बिहारी युवाओं को गैर प्रदेशों की ओर से शुरू से ही पलायन करना पड़ा है जो कि अभी भी जारी है। इस स्थिति में बदलाव नहीं आया है। बिहारी पलायन का एक सकारात्मक पहलू भी रहा है कि रोजगार के कारण होने वाले इस पलायन के कारण बिहारी व भोजपुरिया संस्कृति देश के विभिन्न प्रांतों में फैली और समृद्ध हुई। चाहे बात भाषाई स्तर की हो या फिर गौरवशाली परंपराओं की। आज भोजपुरिया व बिहारी समाज देश के हर हिस्से में मिल जायेगा। बिहारी जनमानस ने अपनी मेहनत व पुरुषार्थ के बल पर देश के हर एक हिस्से में अपनी पहचान बनाने का काम किया है। लेकिन इस दूसरा पहलू काफी दुखद है। यदि इस हिस्से का हम विश्लेषण करते हैं तो बहुत ही मार्मिक दृश्य आंखों के सामने आ जाता है। जरा उस पुत्र की बेबसी व लाचारी को समझने की कोशिश कीजिए कि घर में मां—बाप बूढ़े हैं, उनकी सेवा व देखभाल करने वाला कोई नहीं है लेकिन घर में दो वक्त की रोटी का इंतजाम हो सके, इसके लिए उस इकलौते पुत्र के समक्ष अपने बूढ़े मां—बाप को छोड़कर गैर प्रदेश कमाने जाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। बूढ़े मां—बाप अपने लाल की बाट जोहते हैं। इस इंतजार में दिन—रात उनकी आंखें गीली होती रहती हैं। उस दर्द की आप कल्पना कीजिए। लाचारी, बेबसी बस यही महसूस होता है और कुछ नहीं। इसी तरह किसी की पत्नी अपने पति के घर आने का इंतजार पथराई आंखों से करती है। गैर प्रदेशों में कैसे बिहारी समाज के लोग किन—किन मुसीबतों को झेलकर दो वक्त की रोटी का इंतजाम करते हैं, क्या इस बात का एहसास इन सियासतदानों को है। छोटे से कमरे में एक साथ 8 से 10 लोगों का सोना, आप कल्पना कर सकते हैं कि क्या जीवन स्तर है। यानी कदम—कदम पर संघर्ष। इन सब का प्रमुख कारण है स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं होना। यदि इसके लालूराज जिम्मेदार है तो नीतीश कुमार भी अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकते हैं। किसी भी प्रदेश में औद्योगिक माहौल बनाने के लिए 15 वर्षों का समय कम नहीं होता है। यदि प्रदेश सरकार इस दिशा में गंभीर होती तो बड़े इंड्रस्टीज न सही लेकिन कृषि आधारित लघु व कुटीर उद्योगों को बढ़ावा देकर काफी हद तक बिहार के नौजवानों को स्थानीय स्तर पर रोजगार मुहैया कराया जा सकता था। मौजूदा चुनावी दौर में बिहार का पलायन केंद्रबिंदु में होना चाहिए था लेकिन अफसोस कि ऐसा होता हुआ दिख् नहीं रहा है। इस ज्वलंत मुद्दे पर बिहारी युवाओं को सियासी दलों की जवाबदेही तय करना होगा, अन्यथा यह पलायन का दौर बदस्तूर इसी तरह से जारी रहेगा।

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