दिल्ली। यूपी की प्रमुख राजनीतिक पार्टी बसपा। पूर्व में इस पार्टी से एक नारा जुड़ा हुआ था जो इस प्रकार था — तिलक, तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार। हालांकि इस वक्त बसपा प्रमुख व यूपी की पूर्व सीएम मायावती की ओर से इससे इंकार किया जा रहा है। उनका कहना है कि कभी भी उनकी पार्टी की ओर से ऐसा कोई नारा नहीं दिया गया। दूसरी तरफ जब पूर्व में यह नारा चला था, उससे साफ संदेश दिया गया था कि मनुवाद व सामंतवाद को हाशिये पर रखा जायेगा। मनुवादी व सामंतवाद शब्द का जिक्र पूर्व में कई बार यूपी में राजनीतिक पार्टियों की ओर से किया जाता रहा है। खासतौर से बसपा की ओर से लेकिन मौजूदा वक्त में राजनीति की बदली परिस्थितियों के कारण यूपी की सियासत में इन शब्दों की चर्चा अब सुनने को नहीं मिल रही है। एक वक्त ऐसा भी था जब यूपी की राजनीति में मनुवादी व सामंतवादी जैसे शब्दों का जिक्र करके खूब कोसने का काम किया जाता था लेकिन अब इन शब्दों से परहेज किया जा रहा है। शायद यह इस बात का एहसास है कि केवल एक बिरादरी व वर्ग के बल पर यूपी की सत्ता में नहीं आया जा सकता है। यही कारण है कि तिलक, तराजू और तलवार… जैसा नारा पीछे छूटा। इसके बाद बसपा की ओर से सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला लाया गया जो कि काफी हद तक हिट व फिट रहा। वर्तमान में बसपा की ओर से भगवान परशुराम की मूर्ति लगवाने व उनके नाम पर अस्पतालों की निर्माण की बात सत्ता में आने पर कही जा रही है। यह यूपी की बदली हुई सियासी मिजाज ही है कि एक वक्त वहां पर राजनीतिक गलियारे में दलित, पिछड़े, मनुवाद, सामंतवाद जैसे शब्द खूब चलते थे लेकिन आज की तारीख में सियासत के केंद्र में भगवान परशुराम आ चुके हैं। बसपा का यह बदलाव इस बात की ओर इशारा करती है कि लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियां समय के साथ कैसे अपने आवरण को बदलने का काम करती है। वैसे बसपा की राजनीति का यह बदला ट्रेंड उसको भविष्य में कितना लाभ दे पायेगा, इस पर कुछ भी कहना अभी जल्दबाजी होगा। लेकिन इतना जरूर है कि तिलक, तराजू व तलवार… वाला नारा रह—रहकर लोगों की स्मृति में जरूर प्रकट हो जाता है।

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